शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

नारेहड़ा में मिले 200 चांदी के मुगलकालीन सिक्के

कोटपूतली।  नारेहड़ा की राजकीय प्राथमिक विद्यालय में पानी की टंकी के लिए की जा रही खुदाई के दौरान प्राचीनकालीन सिक्के प्राप्त हुए है। प्र’ाासन के अनुसार से सिक्के चांदी के हैं तथा उर्दु या अरबी भाषा लिखी होने के कारण मुगलकाल के हो सकते हैं। सिक्के मिटटी की एक छोटी मटकी में थे तथा उस पर एक उससे भी छोटा मिटटी का बर्तन रखा था। गांव वालों की सूचना पर पहुंचे एसडीएम दिने’ा जांगिड ने गzामीणों के सामने मटकी से सिक्कों को निकाला और गिनती की। आज के पांच रूपए के आकार के ये सिक्के गिनती में 200 थे।
    गांव मे सिक्के निकलने की खबर के साथ ही सोना निकलने की अफवाह भी फैली जिसके कारण पूरा गांव इन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ा। प्राचीन कालीन ये सिक्के आसपास के गांवों में भी कौतुहल का विषय बने रहे। प्र’ाासन ने इन्हें अपने कब्जे में लेकर पुरातत्व विभाग को भेज दिया है। इस अवसर पर एसडीएम ने खुदाई करने वाले दोनों मजदूरों प्रदीप सिंह व कमल सिंह की ईमानदारी पर खुश होते हुए इन्हें आगामी स्वतंत्रता दिवस पर उपखण्ड स्तरीय समारोह में सम्मानित करने की बात कही है।

बुधवार, 23 मार्च 2011

प्रभा की ‘प्रतिभा’ को मिला अवार्ड

विभिन्न तरह की समस्याओं एवं राजनीतिक प्रपंचों से घिरे इस शहर में जहां लोग अपने आसपास की छोटी-छोटी समस्याओं से दबे हुए हैं वहीं क्षेत्र की इस महिला अधिवक्ता ने जनसमस्याओं को अपनी बुधि चातुर्य और दबंगता से उठाकर ना केवल वकालत के क्षेत्र में बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक और महिलाओं के बौधिक उत्थान के क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। शहर की सफाई से लेकर चिकित्सा-स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा एवं बस-स्टैण्ड, बिजली-पानी जैसी समस्याओं के निराकरण के लिए भी इस ‘प्रतिभा’ ने पुरजोर आवाज उठाई है और उनका निराकरण भी हुआ है। शहर की जनसमस्याओं को लेकर जनहित याचिका लगाने में भी इनका अव्वल स्थान है। क्षेत्र की इस काबिल महिला अधिवक्ता से ‘न्यूज चक्र’ की बातचीत के खास अंश...।

प्रश्न- प्रभा जी, सर्वप्रथम आपको पंजाब केसरी समाचार पत्र द्वारा ‘वुमन केसरी’ का खिताब प्राप्त होने पर हार्दिक शुभकामना।...आप महिला अधिवक्ता हैं और शहर कोटपूतली ग्रामीण परिवेश में ढ़ला हुआ हैं, आपने यहां अपने आपको अपने क्षेत्र में कैसे व्यवस्थित किया?
जवाब- जी हां, कोटपूतली क्षेत्र में शहरी की बजाय ग्रामीण परिवेश की झलक अधिक दिखाई देती है।...तो स्वाभाविक है कि शुरूआत में मुझे भी यहां काफी परेशानी हुई। मेरे पति, जो मुझसे पहले से वकालत कर रहे थे, उनके कार्य पर भी इसका प्रभाव पड़ा। लोग मुझे उनके साथ देखकर हमारी टेबल तक आने में झिझकते थे। लेकिन मैनें स्थिति को भांपते हुए ग्रामीणों से ग्रामीण भाषा एवं आत्मीयता से बातचीत करने के तरीके को अपनाया, और आज हमारी मेहनत और हमारी मंजिल हमारे सामने है।
प्रश्न- आपने कहां तक शिक्षा प्राप्त की है?
जवाब- मैं एम.ए., एलएलबी हूं।
प्रश्न- आप वकील हैं, नियमित प्रेक्टिस करती हैं फिर सामाजिक क्षेत्र की ओर झुकाव या लगाव कैसे हुआ?
जवाब- मैं जब वकालत के लिए घर से निकलती तो सामाजिक समस्याओं की ओर ध्यान जाने लगा, ये समस्याऐं इतनी गंभीर थी लेकिन किसी का ध्यान इस तरफ नहीं था, सबको आंखे बंद कर आगे बढ़ने की आदत पड़ी हुई थी। मैंने कुछ समस्याओं का समाधान ताल्लुक विधिक सेवा समिति में जनहित याचिकायें पेश करके, संबंधित अधिकारियों को नोटिस भिजवाकर के करवाया। कुछ समस्याओं को ज्ञापन व प्रेस विज्ञप्तियों की सहायता से हल करवाया। बस फिर जैसे-जैसे समस्याऐं हल होनें लगी, मेरी इस ओर रूचि बढ़ने लग गयी।
प्रश्न- आपने सामाजिक कार्यों के द्वारा शहर को काफी करीब से देखा है, मैं जानना चाहुंगा कि आपकी नजर में शहर में हो रहे विकास कार्यों की दिशा क्या है?
उत्तर- शहर में इन दिनों काफी विकास कार्य हो रहे हैं। सड़के भी बन रही हैं, हाइवे पर पुल निर्माण का कार्य चालू है। देखने में शहर में विकास हो रहा है लेकिन शहर की मूलभूत समस्याऐं यथा बस-स्टैण्ड, पार्किंग, सीवर लाईन जैसी समस्याऐं तो अभी वहीं की वहीं हैं फिर शहर मंे विकास कार्य हुआ, कैसे कहा जा सकता है।... और फिर हमारे यहां खिलाड़ियों के लिए स्टेडियम भी नहीं है।
प्रश्न- अच्छा, शहर की बड़ी समस्याओं को छोड़ दें, सिर्फ यहां सफाई व्यवस्था की बात करें तो एक नागरिक होने के नाते क्या आप सफाई व्यवस्था से संतुष्ट है?
उत्तर- शहर में जैसी सफाई है सबके सामने हैं, कहने की आवश्यक्ता नहीं है कि नगरपालिका अधिशाषी अधिकारी ने कभी शहर का दौरा कर सफाई व्यवस्था का जायजा भी लिया हो!
प्रश्न- एक महिला होने के नाते आप शहर की महिलाओं से क्या अपेक्षा रखती हैं या उन्हें क्या संदेश देना चाहती हैं?
उत्तर- मैं चाहती हूं कि महिलाऐं अपनी ताकत को समझें। आज महिलाऐं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। हर समस्या का समाधान है, हौसले के साथ समस्या का सामना करना सीखें।

खुले पड़े नालों से पड़े ‘जान के लाले’

क्षेत्र के बानसूर रोड़ पर वार्ड 26, 27 में खुले पड़े नाले को ढ़कने बाबत बसपा के तहसील प्रभारी दीपचंद आर्य ने नगरपालिका अधिशाषी अधिकारी एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार ‘ज्ञापनों ’ के माध्यम अवगत करवाया है। लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस लापरवाही का नतीजा यह रहा कि अब तक इस नाले में गिरने से एक पुरूष की मृत्यु हो चुकी है तथा गत सप्ताह ही एक पांच वर्षीय बच्ची भी इसमें गिरकर जिंदगी गंवा चुकी है। इसके विरोध में भाजपा कार्यकर्ताओं ने जिला मंत्री मुकेश गोयल व देहात अध्यक्ष बनवारी लाल यादव की अगुवाई में नगरपालिका कार्यालय पर अधिशाषी अधिकारी का घेराव भी किया। साथ में शिवसेना के उप जिला प्रमुख अमरसिंह कसाना, बजरंग लाल शर्मा ने भी रोष जताया। लेकिन अभी तक वहां किसी प्रकार की कार्रवाही नहीं की गई है।
दूसरी ओर क्षेत्र के आदर्श नगर में टेलीफोन एक्सचेंज वाली रोड़ पर बना नाला भी जगह जगह से खुला पड़ा है। इस रोड़ पर यातायात का भारी दवाब भी रहता है तथा स्कूल व कॉलेज विद्यार्थियों का आवागमन भी यहीं से अधिक होता है। इस समस्या को कई बार समाचार पत्रों ने प्रमुखता से उठाकर प्रशासन तक पहुंचाने की कौशिश की हैं। लेकिन यहां भी ‘आरामपसंद’ कर्मचारियों ने कोई कार्रवाही करना उचित नहीं समझा। इस नाले में एक जीप भी पलट गई थी, हालांकि उसमें कोई आहत नहीं हुआ था। पशु तो इस नाले में आए दिन गिरते ही रहते हैं। ठीक ऐसी ही स्थिति क्षेत्र के लक्ष्मीनगर में चानचकी रोड़ पर बने नाले की है।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

संसदीय सचिव ब्रह्मदेव कुमावत 13 मार्च को कोटपूतली में

कोटपूतली। संसदीय सचिव ब्रह्मदेव कुमावत 13 मार्च को कोटपूतली पधार रहे हैं। वे यहां सुदरपुरा रोड़ स्थित प्रजापति छात्रावास में आयोजित अश्टम प्रतिभा सम्मान समारोह’ को संबोधित करेगें तथा आरएएस बनवारीलाल बासनीवाल द्वारा बनवाई गई पानी की टंकी का उदघाटन कर छात्रावास को समर्पित करेंगे। इस अवसर पर उनके साथ आरपीएससी चेयरमैन एम एल कुमावत, पदमश्री अर्जुन प्रजापति, विधायक मदन प्रजापति, निर्मल कुमावत, रामस्वरूप कसाना एवं पूर्व विधायक हरीश कुमावत व पूर्व मंत्रि सुरेन्द्र गोयल भी होंगे। इस अवसर पर प्रजापति समाज के कई बड़े भामाशाह भी शिरकत कर रहे हैं।

रविवार, 7 नवंबर 2010

ओछी चादर का शिकार देश का भविष्य!

किसी भी समाज या देश का विकास उसकी शिक्षा पर निर्भर होता है। भारत सरकार ने भी इस क्षेत्र में एक सराहनीय कदम उठाते हुए 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा (आरटीआई)का प्रावधान किया है।

कोई भी अधिनियम बनाना एक बात है और उसे असरदार व प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाना एक अलग बात है। आज अगर हम सरकारी स्कूलोंं के हालतों पर गौर करें तो पायेगें कि हमारी स्कूलों की दशा कितनी खराब है।...फोटो में दिए गये अखबारों की कतरनों से ही साफ जाहिर हो रहा है कि असल में हो क्या रहा है?

प्रदेश में शिक्षकों की स्थिति पर एक नजर....

पदनाम स्वीकृत कार्यरत रिक्त

व्याख्याता 19575 11230 8345

वरि.अध्यापक 37438 29934 7514

अध्यापक 12583 10478 2105

द्वित्तिय श्रेणी 31913 22824 9089

तृतीय श्रेणी 230153 177123 53030

प्रबोधक 28673 23141 5532

इसके अलावा नवक्रमोन्नत माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में अभी पदों की स्वीकृति ही नहीं मिल पायी है और हालात ये हैं कि स्कूल 10वीं तक हो गया लेकिन वहां अभी भी तृतीय श्रेणी शिक्षक ही अध्यापन कार्य करवा रहे हैं और उनकी भी कई स्कूलों में तो संख्या वही है जो उच्च प्राथमिक विद्यालय के समय थी। सच्चाई यह है कि बहुत से स्कूल जो 8वीं या 10वीं कक्षा के स्तर के हैं आज भी 3 या 5 अध्यापकों के भरोसे चल रहे हैं। विषयाध्यापकों के तो कोई ठिकाने ही नहीं हैं। आज भी 9वीं व 10वीं के छात्रों को विज्ञान, अंग्रेजी व गणित जैसे विषय वही तृतीय श्रेणी अध्यापक ही पढ़ा रहे हैं तो हम सोच सकते हैं कि हमारे छात्र-छात्राओं को कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही होगी। इसे बच्चों के भविष्य के साथ सरासर खिलवाड़ नहीं तो और क्या कहें? पिछले 6-7 महीने से हमारे शिक्षामंत्री समानीकरण की कवायद में जुटे हुए थे, उससे ;समानीकरणद्ध कुछ फर्क पड़ा या नहीं यह अलग बात है लेकिन मेरे विचार में तो सरकार का समानीकरण का फामूला ही त्रृटिपूर्ण यानी खामीयुक्त था।

फार्मूले का आधार छात्र संख्या रखी गयी थी ना कि कक्षाओं की संख्या। उदाहरण के तौर पर 1 से 8वीं तक की स्कूल में अगर 150 तक छात्रों की संख्या है तो पांच अध्यापक होंगे तथा 151 से 200 हैं तो 6 अध्यापक होगेंं। इसमें सोचने वाली बात यह है कि 150 छात्रों में भी कक्षाऐं तो आठ ही होंगी।...तो एक कक्षा के लिए एक शिक्षक तो चाहिए ही, अब उसमें छात्र संख्या 20 हो या 12, इससे क्या फर्क पड़ता हैै? सरकार आठवीं तक के स्कूल मेंे 5 अध्यापक लगा रही है, हर किसी के समझ में आता है कि एक समय में एक अध्यापक एक ही कक्षा को पढ़ा सकेगा, तो बाकी तीन कक्षाओं का क्या होगा?...पता नहीं क्यों ये सीधा सा गणित हमारे नीति निर्धारकों के दिमाग में नहीं आया? इसमें भी कोढ़ मंे खाज का काम तब होता है जब अशैक्षिणिक कार्यों के लिए अध्यापकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। कभी जनगणना तो कभी चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे, तो कभी मतदान, कभी पल्स पोलियो।..हर काम में अध्यापक ही नजर आते हैंं।

जब तक सरकारी स्कूलों में पर्याप्त अध्यापक उपलब्ध नहीं होगें, शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर सुधारा जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की खराब गुणवत्ता के कारण ही औसत आय वाले माता पिता अपने बच्चों को उन सस्ते निजी स्कूलों में भर्ती कराने को मजबूर हैं जो सरकारी स्कूलों से बेहतर नहीं होते हुए भी सिर्फ एक बिन्दु के लिए बेहतर हैं वह यह कि उनके वहां कम से कम हर कक्षा के लिए एक अध्यापक तो है चाहे वह मात्र 10वीं या 12वीं पास ही क्यों ना हो। नये कानून के प्रभावी होने से इन सस्ते निजी स्कूूलों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा, क्योंििक अधिनियम के मापदण्डों को पूरा करने के लिए न तो उनके पास अच्छा स्कूल भवन है और ना ही खेल का मैदान है और ना ही वे प्रशिक्षित शिक्षक रखते हैं और ना ही प्रशिक्षित शिक्षकों को निर्धारित वेतन दे पाते हैं। हर शहर, कस्बे, यहां तक की गांवों में आज सस्ते निजी स्कूल गली गली में चल पड़े हैं वो भी रिहायशी मकानों में। ...और यह सब इसलिए चल रहे हैं, क्योंकि हमारी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता उनसे भी खराब है, वहां बच्चों की कक्षा में अध्यापक दिखाई ही नहीं देते। और सरकार ने नई भर्ती करके अध्यापकों की पूर्ती करने की बजाय संख्या बल पर समानीकरण करके पूरे प्रदेश की बहुत सी स्कूलांे में अध्यापक सरप्लस दिखा दिए जबकि वहां तो पहले से ही कमी हैै। अब अगर अधिनियम के दवाब से निजी स्कूल भी बंद हुए तो क्या स्थिति होगी, सोचने का विषय है।

गांव के स्कूलों पर आधारित स्कूली शिक्षा की रिर्पोट ‘असर 2009’ के मुताबिक देश के ग्रामीण स्कूलों में अभी भी 50 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अपेक्षित स्तर से तीन कक्षा नीचे के स्तर पर हैं। यानी कक्षा आठ में पढ़ने वाले आधे बच्चों की लिखने पढ़ने की क्षमता कक्षा पांच के बराबर है और इसका मूल कारण है शिक्षकों की कमी।

यदि इस अधिनियम को वास्तव में प्रभावी बनाना है तो सरकार को सबसे पहले शिक्षकों की पूर्ती करनी होगी और उसके बाद अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए दूसरे मजबूत कदम उठाने पड़ेगें अन्यथा यह अधिनियम भी बेअसर हो जाएगा और बच्चों के भविष्य के साथ यह बहुत बड़ा खिलवाड़ होगा।

...मैं चाहूंगा कि अभिभावक वर्ग भी इसके बारेे में सोचे और अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को स्कूलों में आवश्यक सुविधाऐं व शिक्षक उपलब्ध कराने हेतु आवश्यक कदम उठाने को प्रेरित करें साथ ही आप अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कितने जागरूक हैं और सरकारी विद्यालयों में और क्या अच्छा होना चाहिए, अपने सुझाव एवं विचारों से मुझे अवश्य अवगत करायें।